महिला आरक्षण बिल से पीछे क्यों हटा विपक्ष? - मुकेश सैनी

महिला आरक्षण बिल से पीछे क्यों हटा विपक्ष? - मुकेश सैनी

महिला आरक्षण को लेकर देश की जनता की नजरें संसद पर टिकी थीं जब संसद में “नारी शक्ति वंदन अधिनियम" पर चर्चा शुरू हुई। यह कोई सामान्य विधेयक नहीं था, बल्कि भारत की करोड़ों महिलाओं को राजनीतिक मुख्यधारा में सशक्त भागीदारी देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था।

लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि इस महत्वपूर्ण अवसर पर भी विपक्ष अपनी राजनीति से ऊपर नहीं उठ पाया। बहस के दौरान जिन मुद्दों को उठाया गया, उनमें OBC आरक्षण या तत्काल लागू करने की मांग, वे अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन जिस तरीके से इस विधेयक का विरोध किया गया, उसने नीयत पर सवाल खड़े कर दिए। यह वही देश है जहां पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने कहा था, “आप किसी राष्ट्र की प्रगति का अंदाजा उसकी महिलाओं की स्थिति से लगा सकते हैं।”

इंदिरा गांधी जी ने महिलाओं को शक्ति का प्रतीक मानते हुए उन्हें अवसर देने की आवश्यकता पर जोर दिया था और अटल बिहारी वाजपेई जी ने कहा था, "नारी सम्मान के बिना समाज का विकास सभव नहीं" भारत में आज भी संसद में महिलाओं की भागीदारी लगभग 14–15% और विधानसभाओं में 10% से भी कम है, जबकि दुनिया का औसत इससे कहीं अधिक है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि महिलाओं को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने के लिए ठोस और निर्णायक कदम की आवश्यकता थी।

इसी अंतर को खत्म करने के लिए वर्तमान सरकार ने महिला आरक्षण जैसा ऐतिहासिक निर्णय लिया। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि विपक्ष ने इस पहल का विरोध किया और एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या नारी सशक्तिकरण जैसे मुद्दे पर भी राजनीति हावी रहेगी? आज सवाल यह है कि क्या वर्तमान विपक्ष इन विचारों से सहमत है, या फिर राजनीतिक स्वार्थ ने इन आदर्शों को पीछे छोड़ दिया है? महिला आरक्षण जैसे मुद्दे पर देश को एकजुटता की उम्मीद थी, लेकिन इसके बजाय विरोध और टकराव देखने को मिला।

यह विरोध केवल एक विधेयक का नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक बन गया, जो महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने में भी राजनीति तलाशती है। सच्चाई यह है कि जब भी महिलाओं को अधिकार देने की बात आती है, तब बहाने और शर्तें सामने आ जाती हैं। अगर नीयत साफ होती, तो सुधार के सुझाव बिल के साथ खड़े होकर भी दिए जा सकते थे, न कि उसके रास्ते में बाधा बनकर।

आज देश की महिलाएं यह देख रही हैं कि कौन उनके सशक्तिकरण के साथ खड़ा है और कौन राजनीतिक कारणों से इसे टालना चाहता है। इतिहास गवाह है कि जो समाज अपनी महिलाओं को आगे बढ़ाता है, वही प्रगति करता है,और जो उन्हें पीछे रखता है, वह खुद पीछे रह जाता है।